महत्व

गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा, आभार और समर्पण का पावन पर्व है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। "गुरु" शब्द दो अक्षरों से बना है — "गु" अर्थात् अंधकार और "रु" अर्थात् उसे दूर करने वाला। इस प्रकार गुरु वह है जो अपने शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।

इस दिन शिष्य अपने गुरु का पूजन कर उनका आशीर्वाद लेते हैं और जीवन में उनके मार्गदर्शन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। इसे महर्षि वेद व्यास के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है, इसलिए इसे "व्यास पूर्णिमा" भी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरु ही मनुष्य को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। यही कारण है कि "गुरु बिन ज्ञान नहीं" की भावना हमारी परंपरा की आत्मा रही है।

उत्सव

इस दिन शिष्य अपने गुरु के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं, उन्हें पुष्प, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित करते हैं। आश्रमों, विद्यालयों और मठों में विशेष पूजा, प्रवचन और सत्संग का आयोजन होता है, जहाँ गुरु अपने शिष्यों को जीवन और अध्यात्म का ज्ञान प्रदान करते हैं।

कई भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, वेद व्यास और अपने इष्ट गुरु का स्मरण करते हैं, तथा गीता व अन्य ग्रंथों का पाठ करते हैं। योग और ध्यान के साधक इस दिन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं — यही इस पर्व की सबसे सुंदर परंपरा है।

इतिहास

माना जाता है कि इसी पावन तिथि पर महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने चार वेदों का संकलन किया, महाभारत, अठारह पुराण और श्रीमद्भागवत की रचना की। वे आदिगुरु माने जाते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान दिया और "आदि गुरु" (प्रथम गुरु) बने। बौद्ध परंपरा में इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था।

पौराणिक कथा

महर्षि वेद व्यास पराशर ऋषि और सत्यवती के पुत्र थे। उन्होंने अपार ज्ञान अर्जित कर वेदों को चार भागों — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — में विभाजित किया, ताकि सामान्य मनुष्य भी उन्हें समझ सके। इसी कारण उन्हें "वेद व्यास" कहा गया।

वेद व्यास ने महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ की रचना की, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य उपदेश समाहित है। उन्होंने अठारह पुराण और श्रीमद्भागवत की भी रचना की। उनके इस महान योगदान के प्रति कृतज्ञता स्वरूप गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व गुरु-शिष्य परंपरा की पवित्रता का प्रतीक है और हमें सिखाता है कि ज्ञान की धारा गुरु से शिष्य तक निरंतर प्रवाहित होती रहनी चाहिए।

परंपराएं और रीति-रिवाज
  • गुरु पूजन — गुरु के चरण धोकर पूजा और तिलक
  • चरण स्पर्श — गुरु का आशीर्वाद लेना
  • दक्षिणा अर्पण — गुरु को पुष्प, वस्त्र और दक्षिणा भेंट
  • व्यास पूजा — महर्षि वेद व्यास का स्मरण और पूजन
  • सत्संग और प्रवचन — आश्रमों-मठों में विशेष आयोजन
  • ग्रंथ पाठ — गीता, वेद व अन्य शास्त्रों का पाठ
पूजा विधि
  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • पूजा स्थान को स्वच्छ कर गुरु या व्यास जी का चित्र स्थापित करें
  • दीप, धूप, पुष्प, अक्षत और मिठाई अर्पित करें
  • गुरु के चरणों में प्रणाम कर आशीर्वाद लें
  • गुरु मंत्र का जप करें
  • गीता या शास्त्रों का पाठ करें
  • दक्षिणा अर्पित कर प्रसाद वितरण करें
गुरु मंत्र
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश्वर (शिव) हैं। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं — उन श्री गुरु को मेरा नमस्कार है।
शुभ मुहूर्त 2026
पूर्णिमा तिथि आरंभ
28 जुलाई 2026, शाम 06:18 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त
29 जुलाई 2026, रात 08:05 बजे
पूजन / दर्शन का समय
29 जुलाई — सूर्योदय के बाद से सूर्यास्त से पहले तक
तिथि
आषाढ़ पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा पर कोई विशेष पूजा-मुहूर्त आवश्यक नहीं होता — पूरा दिन शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त सूर्योदय के बाद स्नान कर अपने गुरु एवं बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और मंदिर में दर्शन करते हैं।

विशेष व्यंजन / प्रसाद
खीर हलवा पूरी-सब्जी पंचामृत फल मिठाई
गुरु पूर्णिमा का संदेश

गुरु पूर्णिमा हमें सिखाती है कि जीवन में ज्ञान और मार्गदर्शन देने वाले हर व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए — चाहे वह हमारे शिक्षक हों, माता-पिता हों या आध्यात्मिक गुरु। सच्चा गुरु शिष्य के भीतर के अंधकार को दूर कर आत्मज्ञान का प्रकाश जगाता है।

यह पर्व विनम्रता, श्रद्धा और सीखते रहने की भावना का प्रतीक है। आज के आधुनिक युग में भी गुरु का महत्व कम नहीं हुआ है — हमारे जीवन में कई रूपों में गुरु आते हैं जो हमें सही राह दिखाते हैं। गुरु पूर्णिमा हमें रुककर उन सभी को याद करने और धन्यवाद देने का अवसर देती है, जिनके कारण हम आज जो हैं वो बन पाए। सच्ची गुरु-दक्षिणा यही है कि हम उनके सिखाए मार्ग पर चलें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: गुरु पूर्णिमा 2026 कब है?
उत्तर: गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई 2026, बुधवार को है। पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई शाम 06:18 बजे से 29 जुलाई रात 08:05 बजे तक रहेगी।

प्रश्न: गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?
उत्तर: यह पर्व गुरु के प्रति श्रद्धा और आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।

प्रश्न: गुरु पूर्णिमा पर क्या करना चाहिए?
उत्तर: इस दिन स्नान कर अपने गुरु, शिक्षक और बड़ों का आशीर्वाद लें, मंदिर में दर्शन करें, ग्रंथ पाठ और सत्संग करें, तथा दान-पुण्य करें।

प्रश्न: गुरु मंत्र कौन सा है?
उत्तर: "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः" — यह सबसे प्रसिद्ध गुरु मंत्र है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • गुरु का आदरपूर्वक पूजन करें
  • बड़ों और गुरुजनों का आशीर्वाद लें
  • दान-पुण्य और सेवा करें
  • ग्रंथों का पाठ और सत्संग करें
  • स्वच्छ वस्त्र पहन कर व्रत रखें

क्या न करें

  • गुरु या बड़ों का अनादर न करें
  • क्रोध, अहंकार और विवाद से बचें
  • तामसिक भोजन (मांस-मदिरा) से बचें
  • झूठ और छल से दूर रहें
  • इस दिन आलस्य में समय न गँवाएँ